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जिला पंचायत के लोक सूचना अधिकारी का अजीब तर्क, आरटीआई पंजी को बताया व्यक्तिगत जानकारी

जनवरी 2014 से अब तक की आरटीआई पंजी मांगी तो निजता का हवाला देकर आवेदन लौटाया, सूचना के अधिकार की पारदर्शिता पर उठे गंभीर सवाल

विदिशा। एमपी धमाका

विदिशा जिला पंचायत में सूचना के अधिकार अधिनियम 2005 के क्रियान्वयन को लेकर एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने प्रशासनिक पारदर्शिता और जवाबदेही पर सवाल खड़े कर दिए हैं। जिला पंचायत के लोक सूचना अधिकारी ने आरटीआई पंजी की जानकारी देने से यह कहते हुए इनकार कर दिया कि मांगी गई जानकारी व्यक्तिगत सूचना की श्रेणी में आती है और इसका किसी लोक क्रियाकलाप या लोकहित से संबंध नहीं है।

जानकारी के अनुसार, आवेदक ने 2 नवंबर 2026 को सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 6(1) के तहत आवेदन प्रस्तुत कर जनवरी 2014 से आवेदन के निराकरण होने तक की आरटीआई पंजी उपलब्ध कराने की मांग की थी। लेकिन जिला पंचायत के लोक सूचना अधिकारी ने 3 नवंबर 2026 को जारी पत्र में धारा 8(1)(ज) का हवाला देते हुए जानकारी देने से इनकार कर दिया।

पत्र में तर्क दिया गया है कि ऐसी सूचना, जिसका किसी लोक क्रियाकलाप या लोकहित से संबंध नहीं है अथवा जिसके प्रकटीकरण से किसी व्यक्ति की निजता का अतिक्रमण होता है, उसे उपलब्ध नहीं कराया जा सकता।

अब सवाल यह है कि क्या सरकारी कार्यालय में संधारित आरटीआई आवेदनों और उनके निराकरण की पंजी भी व्यक्तिगत जानकारी है?

आरटीआई पंजी सरकारी कार्यालय में सूचना के अधिकार के तहत प्राप्त आवेदनों, उनके निराकरण और प्रशासनिक कार्यप्रणाली से जुड़ा अभिलेख है। ऐसे में पूरी पंजी को व्यक्तिगत जानकारी बताकर रोकने के औचित्य पर सवाल उठना स्वाभाविक है। यदि पंजी में किसी आवेदक की निजी या संवेदनशील जानकारी दर्ज है तो संबंधित अंश हटाकर शेष अभिलेख उपलब्ध कराने के कानूनी प्रावधान पर भी विचार किया जा सकता है।

सूचना का अधिकार अधिनियम का मूल उद्देश्य ही सरकारी कामकाज में पारदर्शिता लाना और अधिकारियों की जवाबदेही सुनिश्चित करना है। ऐसे में यदि सरकारी कार्यालयों में आरटीआई से संबंधित अभिलेखों की जानकारी भी उपलब्ध नहीं होगी तो पारदर्शिता का उद्देश्य कैसे पूरा होगा?

तारीखों और आदेशों से आगे अब जवाबदेही का सवाल!

इस पूरे मामले में जिला पंचायत के लोक सूचना अधिकारी के निर्णय ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या धारा 8(1)(ज) का इस्तेमाल पूरी आरटीआई पंजी रोकने के लिए उचित है? क्या आवेदन पर बिंदुवार विचार किया गया? क्या अपवाद के दायरे में आने वाली सूचनाओं को अलग कर शेष जानकारी दी जा सकती थी?

अब देखना होगा कि इस मामले में प्रथम अपील के माध्यम से क्या स्थिति सामने आती है और सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई जानकारी आवेदक को मिल पाती है या नहीं।

एमपी धमाका की नजर इस मामले पर बनी रहेगी।

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