अवैध कॉलोनियों की जानकारी दबाने का खेल?
अपर कलेक्टर के आदेश में ही गायब हो गया मूल मुद्दा, SDM ने भी नहीं किया पालन!
विदिशा, दीपक तिवारी
विदिशा में अवैध कॉलोनियों से जुड़ी जानकारी मांगने वाले एक आरटीआई मामले ने प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 के तहत मांगी गई जानकारी को लेकर पहले तो समय पर जवाब नहीं दिया गया, फिर प्रथम अपील में अपर कलेक्टर द्वारा पारित आदेश में ही “अवैध कॉलोनियों” का उल्लेख गायब कर दिया गया। अब आदेश के पालन न होने से पूरे मामले पर संदेह गहराता जा रहा है।
अपीलकर्ता द्वारा 27 फरवरी 2026 को लोक सूचना अधिकारी एवं एसडीएम विदिशा से अवैध कॉलोनियों से संबंधित जानकारी मांगी गई थी। जानकारी निर्धारित समय सीमा में उपलब्ध नहीं कराई गई, जिसके बाद मामला प्रथम अपील में पहुंचा।
12 मई 2026 को अपर कलेक्टर एवं प्रथम अपीलीय अधिकारी द्वारा आदेश जारी किया गया। आदेश में यह तो लिखा गया कि मांगी गई जानकारी उपलब्ध कराई जाए, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण तथ्य — “अवैध कॉलोनियों” से संबंधित जानकारी- आदेश में स्पष्ट रूप से दर्ज ही नहीं की गई। इससे यह सवाल उठने लगे हैं कि क्या जानबूझकर मूल विषय को आदेश से हटाया गया?
इतना ही नहीं, आदेश जारी होने के बाद भी एसडीएम कार्यालय द्वारा जानकारी उपलब्ध नहीं कराई गई। आदेश में 15 दिन के भीतर पालन प्रतिवेदन प्रस्तुत करने के निर्देश दिए गए थे, लेकिन अब तक पालन नहीं होने से प्रशासन की कार्यशैली कटघरे में है।
मामले को लेकर शहर में चर्चाओं का बाजार गर्म है। लोगों का कहना है कि यदि जानकारी सामान्य थी तो उसे छिपाने की जरूरत क्या थी? आखिर अवैध कॉलोनियों के मामले में इतनी चुप्पी क्यों? क्या कहीं न कहीं जिम्मेदार अधिकारी अवैध निर्माण और कॉलोनियों को संरक्षण देने में लगे हैं?
जानकारों का कहना है कि सूचना अधिकार कानून का उद्देश्य पारदर्शिता लाना है, लेकिन जब आदेशों में ही मूल विषय गायब होने लगे और आदेशों का पालन न हो, तो यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए गंभीर चिंता का विषय है।
अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या जिला प्रशासन इस मामले में जवाबदेही तय करेगा या फिर अवैध कॉलोनियों का सच फाइलों में ही दबा रहेगा।
आरटीआई में मांगी थी अवैध कॉलोनियों की जानकारी!
27 फरवरी 2026 को अपीलकर्ता द्वारा लोक सूचना अधिकारी एवं एसडीएम विदिशा से सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 के तहत अवैध कॉलोनियों से संबंधित जानकारी मांगी गई थी। निर्धारित समय सीमा बीत जाने के बावजूद कोई जवाब नहीं दिया गया।
प्रथम अपील में पहुंचा मामला!
समय पर जानकारी नहीं मिलने के बाद मामला प्रथम अपील में पहुंचा। अपीलकर्ता ने सूचना अधिकार अधिनियम की धारा 19(1) के तहत अपर कलेक्टर एवं प्रथम अपीलीय अधिकारी के समक्ष अपील प्रस्तुत की।
आदेश में ही गायब हो गया मूल मुद्दा!
12 मई 2026 को अपर कलेक्टर एवं प्रथम अपीलीय अधिकारी द्वारा आदेश पारित किया गया। आदेश में जानकारी उपलब्ध कराने के निर्देश तो दिए गए, लेकिन जिस विषय पर जानकारी मांगी गई थी, अर्थात "अवैध कॉलोनियां", उसका स्पष्ट उल्लेख आदेश में नहीं किया गया।
एसडीएम कार्यालय ने नहीं किया आदेश का पालन!
अपर कलेक्टर के आदेश में 15 दिन के भीतर जानकारी उपलब्ध कराने और पालन प्रतिवेदन प्रस्तुत करने के निर्देश दिए गए थे। आरोप है कि इसके बावजूद एसडीएम कार्यालय द्वारा अब तक जानकारी उपलब्ध नहीं कराई गई।
उठ रहे हैं कई सवाल!
क्या अवैध कॉलोनियों से जुड़ी जानकारी को जानबूझकर रोका जा रहा है?
आदेश में मूल विषय का उल्लेख क्यों नहीं किया गया?
आदेश के पालन में देरी या अनदेखी के लिए जिम्मेदार कौन है?
क्या अवैध निर्माण और कॉलोनियों को संरक्षण मिल रहा है?
पारदर्शिता पर उठे सवाल?
जानकारों का कहना है कि सूचना का अधिकार अधिनियम पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए बनाया गया है। यदि आदेशों में ही मूल विषय गायब हो जाए और उनके पालन में भी लापरवाही बरती जाए, तो यह प्रशासनिक जवाबदेही पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है।
अब प्रशासन के फैसले पर नजर!
अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि जिला प्रशासन इस मामले में जवाबदेही तय करता है या फिर अवैध कॉलोनियों से जुड़ा पूरा मामला फाइलों में ही दबकर रह जाएगा?