"AI के युग में आध्यात्मिकता ही मानवीय मूल्यों की रक्षा करेगी : -राष्ट्रसंत मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज
एमपी धमाका
गिरीडीह गुणायतन में आयोजित श़ंका समाधान कार्यक्रम में प्रवक्ता अविनाश जैन के प्रश्न के उत्तर में मुनि श्री प्रमाण सागर जी ने कहा "AI के साथ SI (Spiritual Intelligence) भी विकसित करें, आधुनिकता और आध्यात्मिकता का समन्वय ही मानवता के सुरक्षित भविष्य का आधार है, मुनि श्री ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), सम्यग्दर्शन, श्रद्धा एवं सकारात्मक सोच जैसे समसामयिक एवं आध्यात्मिक विषयों पर श्रद्धालुओं की जिज्ञासाओं का समाधान करते हुए कहा कि "AI के इस युग में आध्यात्मिकता ही मानवीय मूल्यों की रक्षा कर सकती है।"
उन्होंने कहा कि आज यह स्वाभाविक जिज्ञासा है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता के बढ़ते प्रभाव से कहीं मानवीय बुद्धि, संवेदनाएँ, करुणा, विवेक और आत्मचिंतन का महत्व कम तो नहीं हो जाएगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि तकनीक स्वयं समस्या नहीं है, बल्कि उसका उपयोग करने वाला मनुष्य महत्वपूर्ण है। यदि व्यक्ति के हृदय में आध्यात्मिकता है तो तकनीक उसके लिए सहायक बनेगी, बाधक नहीं।
मुनि श्री ने कहा कि "AI (Artificial Intelligence) के साथ SA (Spiritual Intelligence) भी विकसित करें।" आधुनिकता और आध्यात्मिकता का समन्वय ही मानवता के सुरक्षित एवं उज्ज्वल भविष्य का आधार है। आधुनिक तकनीक को आध्यात्मिक चेतना के साथ अपनाने वाला व्यक्ति समय के साथ अपडेट भी रहेगा और उसका जीवन संतुलित एवं सुरक्षित भी रहेगा। आध्यात्मिकता के अभाव में आधुनिकता का अंधानुकरण अंततः मानव के लिए संकट का कारण बन सकता है।
उन्होंने कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता का विकास भी मानव मस्तिष्क की अद्भुत क्षमता का परिणाम है। हमारे न्यूरल सिस्टम की कार्यप्रणाली से प्रेरणा लेकर ही AI का निर्माण हुआ है। जब मनुष्य अपनी बुद्धि के बल पर इतनी उन्नत तकनीक विकसित कर सकता है, तो आध्यात्मिक साधना के माध्यम से वह अपने व्यक्तित्व और चेतना को इससे भी अधिक ऊँचाइयों तक ले जा सकता है।
मुनि श्री ने कहा कि तकनीक का विरोध करना समाधान नहीं, बल्कि उसका विवेकपूर्ण एवं सदुपयोग करना आवश्यक है। आधुनिक तकनीक के साथ जब आध्यात्मिक चेतना जुड़ती है, तब मानवीय संवेदनाएँ स्वतः विकसित होती हैं और उन्हीं संवेदनाओं से मानवीय मूल्य सुरक्षित एवं सशक्त बने रहते हैं।
एक अन्य प्रश्न के उत्तर में मुनि श्री ने कहा कि देव, शास्त्र और गुरु में सच्ची श्रद्धा हो तो अभक्ष्य का सेवन संभव ही नहीं है। उन्होंने कहा कि केवल श्रद्धा का दावा करना पर्याप्त नहीं, बल्कि जीवन का आचरण भी उसी के अनुरूप होना चाहिए। भगवान में श्रद्धा है तो उनकी वाणी में भी श्रद्धा होनी चाहिए, गुरु में श्रद्धा है तो उनके आदर्शों में भी और शास्त्र में श्रद्धा है तो शास्त्र जीवन का प्रमाण बनना चाहिए।
उन्होंने स्पष्ट किया कि सम्यग्दर्शन का संबंध केवल बाहरी क्रियाओं से नहीं, बल्कि अंतःकरण की शुद्ध श्रद्धा से है। देश, काल, परिस्थिति एवं व्यक्ति की आंतरिक परिणति को ध्यान में रखे बिना किसी के आध्यात्मिक स्तर का अंतिम निर्णय नहीं किया जा सकता। फिर भी जो व्यक्ति धर्मानुकूल वातावरण प्राप्त होने के बाद भी जानबूझकर अभक्ष्य का सेवन करता है, वह जैन आचरण का सही अनुयायी नहीं कहा जा सकता।
एक अन्य शंका का समाधान करते हुए मुनि श्री ने कहा कि "सोच बदलने से तपस्या बन जाती है और सोच बिगड़ने पर तपस्या भी समस्या दिखाई देने लगती है।" जीवन का वास्तविक परिवर्तन परिस्थितियों से नहीं, बल्कि सोच बदलने से होता है। उन्होंने कहा कि दूसरा आपको मनाए और आप मान जाएँ, यह पराधीनता है; किंतु अपने मन को स्वयं मनाना सीख जाएँ, यही वास्तविक साधना है।
उन्होंने कहा कि जो परिस्थितियाँ बदली जा सकती हैं, उन्हें बदलने का प्रयास करें और जिन्हें बदलना संभव नहीं है, उन्हें सहज भाव से स्वीकार कर लें। मन का दमन साधना नहीं है। मन को दबाने से नहीं, बल्कि उसे सही दिशा देने से जीवन सफल बनता है। "मन से लड़ने वाले हर जगह हार जाते हैं और मन को मोड़ने वाले जीवन-सागर से तर जाते हैं।"
अपने प्रवचन में मुनि श्री ने भगवान महावीर के समय की एक प्रेरक घटना का उल्लेख करते हुए बताया कि एक ध्यानस्थ मुनिराज क्षणभर के लिए रौद्र ध्यान में चले गए थे, किंतु आत्मबोध होते ही उनकी परिणति बदल गई और वे केवल ज्ञान को प्राप्त हुए। इस प्रसंग से स्पष्ट होता है कि जीवन का परिवर्तन बाहरी परिस्थितियों से नहीं, बल्कि मन की दिशा बदलने से होता है।
गुणायतन मध्यभारत के राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन 'विद्यावाणी' ने बताया इस अवसर पर बैंकॉक निवासी मात्र 8 वर्षीय बालक ने अद्भुत श्रद्धा और उत्साह का परिचय देते हुए मुनि श्री स संघ के साथ श्री सम्मेदशिखर जी की लगभग 9 किलोमीटर की पर्वत वंदना पैदल पूरी की। बालक की धर्मनिष्ठा और लगन ने उपस्थित श्रद्धालुओं को भावविभोर कर दिया। इस अवसर पर गुणायतन के सी ई ओ सुभाष जी, वीरेन्द छावडा, धैर्य जैन (भोपाल), विवेक जैन (कुनकुरी), अक्षय जैन, आज़ाद जैन (इंदौर), अनिमेष जैन (गोमिया) सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु भी साथ रहे प्रातःकाल शांति धारा मुनिश्री के मुखारविंद से की गई।