विदिशा, एमपी धमाका
जिले में ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (सीएमएचओ) द्वारा जारी आदेश में कलेक्टर के निर्देशों का हवाला देते हुए कई महिला आयुष चिकित्सकों की ड्यूटी शहरी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और मुख्यमंत्री संजीवनी क्लीनिकों में लगा दी गई है। इससे दूरस्थ ग्रामीण क्षेत्रों के आयुष औषधालय चिकित्सकविहीन होने की आशंका गहरा गई है।
बरसात के मौसम में संक्रामक रोगों का खतरा सबसे अधिक रहता है। ऐसे समय में गांवों के औषधालयों से चिकित्सकों को हटाकर शहरों में तैनात करना ग्रामीण मरीजों की स्वास्थ्य सुविधाओं पर सीधा असर डाल सकता है। ग्रामीण क्षेत्रों में पहले से ही डॉक्टरों की कमी बनी हुई है, ऐसे में यह व्यवस्था लोगों की परेशानी बढ़ाने वाली साबित हो सकती है।
आदेश में जिन महिला चिकित्सकों की ड्यूटी शहरी स्वास्थ्य केंद्रों में लगाई गई है, वे मूल रूप से ग्रामीण औषधालयों में पदस्थ हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि यदि गांवों के औषधालय नियमित चिकित्सक के बिना संचालित होंगे तो सामान्य उपचार से लेकर मौसमी बीमारियों की रोकथाम तक प्रभावित होगी।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या ग्रामीण क्षेत्रों की स्वास्थ्य सेवाओं को कमजोर कर शहरी व्यवस्था मजबूत करना उचित है? यदि कलेक्टर के निर्देशों का उद्देश्य स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाना था, तो क्या गांवों को चिकित्सकविहीन करना उसी दिशा में उठाया गया कदम माना जाए?
ग्रामीणों और स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े लोगों की मांग है कि शहरों की व्यवस्था सुधारने के साथ-साथ गांवों की स्वास्थ्य सेवाओं को भी प्राथमिकता दी जाए, ताकि बरसात के मौसम में किसी भी ग्रामीण को उपचार के लिए भटकना न पड़े।