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फिल्मी गीतों में छाए, सियासत में आए..विट्ठल भाई पटेल यूं याद आए..!

(पुण्यतिथि 7 सितंबर पर एमपी धमाका विशेष) 

सागर की माटी से उठी वह आवाज, जिसने फिल्मी गीतों में धूम मचाई और राजनीति में सादगी की मिसाल कायम की..!

गीतों से सियासत तक—विट्ठल भाई पटेल का सफर


एमपी धमाका 
सागर। मध्यप्रदेश के सागर की धरती ने साहित्य, कला और राजनीति के क्षेत्र में कई प्रतिभाएं दी हैं। इन्हीं में एक ऐसा नाम है, जिसे फिल्मी गीतों की लोकप्रियता और जनसेवा की राजनीति—दोनों के लिए याद किया जाता है। यह नाम है स्वर्गीय श्री विट्ठल भाई पटेल का।

21 मई 1936 को सागर में जन्मे श्री विट्ठल भाई पटेल ने अपने जीवन में कई भूमिकाएं निभाईं। वे कवि थे, गीतकार थे, समाजसेवी थे और सक्रिय राजनेता भी। हिंदी के साथ उन्होंने बुंदेली में भी लेखन किया। उपलब्ध स्रोतों के अनुसार उन्होंने करीब 55 हिंदी फिल्मी गीत लिखे और कविता की पांच पुस्तकें भी प्रकाशित हुईं।

‘बॉबी’ के गीतों ने घर-घर पहुंचाया नाम

विट्ठल भाई पटेल के फिल्मी सफर की सबसे चमकदार पहचान 1973 की चर्चित फिल्म ‘बॉबी’ से जुड़ी है। इस फिल्म के गीत ‘झूठ बोले कौवा काटे’ और ‘ना मांगू सोना चांदी’ आज भी हिंदी सिनेमा के यादगार गीतों में गिने जाते हैं।

‘झूठ बोले कौवा काटे’ की लोकप्रियता के पीछे बुंदेलखंड की लोक-संस्कृति की छाप भी दिखाई देती है। बुंदेलखंड में कौए को लेकर सच-झूठ से जुड़ी लोकमान्यताएं और कहावतें लंबे समय से लोकजीवन का हिस्सा रही हैं। यही लोकभावना आगे चलकर फिल्मी गीत का हिस्सा बनी।

विट्ठल भाई का फिल्मी लेखन केवल एक-दो लोकप्रिय गीतों तक सीमित नहीं था। ‘धर्मवीर’ सहित कई फिल्मों के लिए उन्होंने गीत लिखे। ‘बंद हो मुट्ठी तो लाख की’ भी उनके चर्चित गीतों में शामिल रहा।

कविता से गीतकार बनने की कहानी

विट्ठल भाई का फिल्मी सफर भी दिलचस्प था। एक प्रसंग के अनुसार उनकी लिखी पंक्तियों ने राज कपूर का ध्यान आकर्षित किया और यहीं से उनके फिल्मी गीतकार बनने का रास्ता खुला। बाद में उनकी लेखनी ने हिंदी सिनेमा में अपनी अलग पहचान बनाई।

उनकी लेखनी में बुंदेलखंड की मिट्टी, लोकजीवन और सहज बोलचाल की मिठास दिखाई देती थी। शायद यही कारण था कि उनके गीत कठिन साहित्यिक भाषा के बजाय सीधे आम आदमी के दिल तक पहुंचते थे।

फिर लौट आए अपनी धरती पर

फिल्मी दुनिया में पहचान मिलने के बावजूद विट्ठल भाई पटेल की जड़ें अपनी मिट्टी से जुड़ी रहीं। सागर और बुंदेलखंड उनके लिए केवल जन्मभूमि नहीं, बल्कि उनकी रचनात्मक चेतना का आधार भी रहा।

फिल्मी दुनिया में सक्रिय रहने के बाद उन्होंने सार्वजनिक जीवन और राजनीति का रास्ता चुना। वे कांग्रेस से जुड़े और सुरखी विधानसभा क्षेत्र से दो बार मध्यप्रदेश विधानसभा के सदस्य निर्वाचित हुए। उन्होंने अर्जुन सिंह, मोतीलाल वोरा और श्यामाचरण शुक्ल के मंत्रिमंडलों में भी मंत्री के रूप में जिम्मेदारी संभाली।

सत्ता में रहे, लेकिन सादगी नहीं छोड़ी

विट्ठल भाई पटेल की राजनीतिक पहचान केवल मंत्री या विधायक के रूप में नहीं बनी। उन्हें सरल, सहज और ईमानदार राजनेता के रूप में याद किया जाता है।

उनके बारे में प्रकाशित संस्मरणों में उनकी सादगी, समय की पाबंदी और जनसरोकारों के प्रति संवेदनशीलता का उल्लेख मिलता है। एक प्रसंग में उन्हें सार्वजनिक व्यवस्था की उपेक्षा के खिलाफ खुद सफाई करते हुए भी याद किया गया है।

उनका व्यक्तित्व इस मायने में अलग था कि फिल्मी दुनिया की चमक और राजनीतिक सत्ता—दोनों से गुजरने के बावजूद आम आदमी से उनका जुड़ाव बना रहा।

बुंदेलखंड की आवाज बनने की कोशिश

विट्ठल भाई पटेल बुंदेलखंड की समस्याओं और उसकी अलग पहचान को लेकर भी सक्रिय रहे। प्रकाशित विवरणों के अनुसार वे जीवनभर पृथक बुंदेलखंड राज्य के आंदोलन से जुड़े रहे।

उनके लिए बुंदेलखंड केवल भौगोलिक क्षेत्र नहीं था। यह उनकी भाषा, संस्कृति, लोक परंपरा और सामाजिक सरोकारों की भूमि थी। यही वजह है कि उनके लेखन और सार्वजनिक जीवन में बुंदेलखंड की छाप बार-बार दिखाई देती है।

राज कपूर से रहा खास जुड़ाव

सागर से विट्ठल भाई का फिल्मी रिश्ता सिर्फ गीत लिखने तक सीमित नहीं था। जब राज कपूर की फिल्म ‘तीसरी कसम’ की शूटिंग के सिलसिले में फिल्म यूनिट सागर आई थी, तब विट्ठल भाई ने शूटिंग के इंतजामों में सहयोग किया था। सागर से राज कपूर के जुड़ाव की कई यादों में उनका नाम आता है।

इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि वे फिल्म जगत और अपनी जन्मभूमि के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी की तरह थे।

आज भी गीतों में जिंदा हैं विट्ठल भाई

7 सितंबर 2013 को सागर की इसी धरती पर उनका निधन हुआ। उनकी उम्र को लेकर कुछ प्रकाशित स्रोतों में अंतर मिलता है, लेकिन जन्मतिथि 21 मई 1936 और निधन की तारीख 7 सितंबर 2013 व्यापक रूप से दर्ज हैं।

उनके जाने के वर्षों बाद भी जब रेडियो, टेलीविजन या सोशल मीडिया पर ‘झूठ बोले कौवा काटे’ या ‘ना मांगू सोना चांदी’ जैसे गीत सुनाई देते हैं, तो सागर की उस प्रतिभा की याद ताजा हो जाती है जिसने बुंदेलखंड की मिट्टी से उठकर हिंदी सिनेमा तक अपनी आवाज पहुंचाई थी।

गीतकार से राजनेता तक—एक पूरा सफर

विट्ठल भाई पटेल की कहानी केवल एक फिल्मी गीतकार की कहानी नहीं है। यह उस व्यक्ति की कहानी है जिसने कविता को गीत बनाया, गीतों से पहचान बनाई, राजनीति में कदम रखा, मंत्री की जिम्मेदारी संभाली और फिर भी अपनी मिट्टी तथा आम आदमी से जुड़ाव नहीं छोड़ा।

आज उनके गीत लोकप्रिय संस्कृति का हिस्सा हैं और उनका सार्वजनिक जीवन सागर-बुंदेलखंड की स्मृतियों का हिस्सा। यही उनकी सबसे बड़ी विरासत है—गीतों में लोकप्रियता और जीवन में सादगी।

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